Biography (& some beliefs, convictions)

 BIOGRAPHY “NAGME KISSE BAATEIN YAADEIN’ by Rakesh Anand Bakshi is now published as a book:  http://bit.ly/AnandBakshi

 

AIM IN LIFE

 
Available at: http://bit.ly/AnandBakshi 
 
… back page: with Dilip K, Saira B, Rajesh K, Sahir:
 
 
 
 
Chapter 10: “The Best News Is That I Am Alive, And They Say This Feeling Is The Happiest Of All” 
 
 

Preface 1 of biography A Note By The Family- by Suman Vinay Datt (Daughter of Anand Bakshi)

Anand Bakshi ki sabse badi kavita.

सुमन विनय दत्‍त।

राकेश बख्‍़शी ने हमारे पिता आनंद बख़्शी के संस्‍मरणों की ये जो किताब लिखी है, ये उनके गुज़रने के अठारह साल बाद आपके सामने आ रही है। हम सभी भाई बहन राजेश, कविता और मैं अपने भाई राकेश के शुक्रगुज़ार हैं, जो सन 2002 से ही डैडी की ज़िंदगी की दास्‍तान काग़ज़ पर उतारने में लगा हुआ था। उसने इसमें बख्‍़शी साहब के और अपने कई दोस्‍तों, रिश्‍तेदारों और साथियों की यादें, उनकी बातें और उनके विचार शामिल किए हैं। इसमें बख़्शी साहब की फिल्‍म-संसार में कामयाब हो जाने तक और उसके बाद की जद्दोजेहद भी शामिल है। बख्‍़शी साहब बचपन से ही फिल्‍मों में आने का सपना देखते रहे थे। हमारे पिता ने ना सिर्फ़ अपने सपने को पूरा करने की कोशिश की बल्कि हर अच्‍छे-बुरे वक्‍त में अपने परिवार का पूरी तरह से ख़याल रखा। उन्‍होंने इस बात का पूरा ख्‍़याल रखा कि उनके बच्‍चों और पत्‍नी कमला, जो हर क़दम पर उनका सबसे बड़ा सहारा थीं, इन सबको मार्गदर्शन मिले और पैसों की कोई कमी ना महसूस हो।

राकेश ने पूरे जुनून, नाज़ुकी और इज़्ज़त से आनंद बख़्शी की ज़िंदगी को उकेरा है। उन्‍होंने एक गीतकार और परिवार के एक मुखिया के रूप में बख़्शी साहब की प्रगति की यात्रा की पूरी रचनात्‍मकता के साथ पड़ताल की है। इसमें उन्‍हें कुछ बहुत ही हैरत भरे काग़ज़ात की मदद भी मिली है, जिन्‍हें डैडी ने इतने दशकों तक संजो कर रखा था, यानी अपने स्‍कूल के ज़माने से।

मैंने इस पुस्‍तक में जब आनंद बख़्शी के बचपन के दिनों वाला रोचक अध्‍याय पढ़ा, उसके बाद उनकी शुरूआती कामयाबी के दिन और फिर सुभाष घई साहब द्वारा अड़सठवें जन्‍मदिन पर उन्‍हें एक मुकुट पहनाकर सम्‍मानित किया जाने की घटना पढ़ी, तो जैसे मैंने अपनी ज़िंदगी के बयालीस साल फिर से जी लिए और मुझे ऐसा महसूस हुआ कि डैडी इस वक्‍त भी हमारे साथ हैं।  

एक बेमिसाल गीतकार और बुद्धिजीवी आनंद बख़्शी के ये संस्मरण बहुत शिद्दत भरे हैं। बख़्शी साहब ने इंसानी रिश्‍तों के हर पहलू को अपने सरल शब्‍दों वाले गीतों के ज़रिए दर्शाया ताकि एक आम आदमी भी इसे आसानी से समझ पाए। उनका सपना था कि वो आखिरी सांस तक लिखते रहें और ऐसा ही हुआ। तीस मार्च 2002 को इस दुनिया से रूख़सत होने तक उन्‍होंने क़रीब तीन साढ़े तीन हज़ार गाने लिख लिए थे और साबित कर दिया था कि वो लाखों में एक थे। बल्कि ये कहूं कि वो करोड़ों या अरबों में एक थे। उन्‍हें उनके परिवार वाले, दोस्‍त और साथी ही याद नहीं करते बल्कि दुनिया भर में फैले उनके दीवान बहुत ज़्यादा याद करते हैं। उन्‍हें कभी भुलाया नहीं जा सकता। इसकी गवाही इस बात से मिलती है कि हाल की कुछ फिल्‍मों में उनके लिखे गानों को रीमिक्‍स किया गया है या नये रूप‍ में पेश किया गया है।

मेरे पिता मेरे हीरो थे और आज भी हैं। वो एक बेमिसाल शख़्स थे। मैं रोज़ उन्‍हें ‘मिस’ करती हूं। उनके बिना ज़िंदगी एकदम बदल गयी है। पर मैं बहुत खुशनसीब हूं कि मैं उनकी बेटी हूं और मुझे उन्‍हें ‘डैडी’ कहकर पुकारने का सौभाग्‍य

 

 

English:

This memoir about My/Our father Anand Bakshi ji the legend by Rakesh Bakshi is seeing the light of day after 18 years of his passing away. My siblings, Rajesh, Kavita and I are very thankful to the Remarkable efforts of our brother Rakesh who has been working to put our daddy’s life journey on paper since 2002, with the help of memories, expressions and impressions of many of his and our Father’s friends, relatives and associates; his struggles till and after he became a significant part of the film world which he dreamt of since he was a teen. Our father not only worked at fulfilling his dream, also saw to his family’s needs and comforts through thick and thin. He ensured his children and wife Kamla his biggest supporter, had the guidance and financial support they need.

Rakesh traces Anand Bakshi’s life with passion, tenderness and reverence. Tracing his evolution to the optimum level of creativity as a lyricist and as the family man we knew, with the assistance of some unbelievable documents preserved by our father through THE DECADES, from the time he was in school!

 As I read through the well-defined chapters of his formative years as a child and his challenges up to his early years of success to finally being honoured by MR. SUBHASH GHAI WITH A CROWN ON HIS 68th BIRTHDAY AS THE KING OF LYRICISTS, I relive in flashback the last 42 years of his life which I Remember and I feel daddy is alive again!!!

This high-spirited memoir traces the life of this inimitable public intellectual whose depiction of every aspect of human relations through his SIMPLE lyrics made even a common man understand and identify with easily. His dream was to be writing till his last breath which he did. He wrote approximate 3000-3500 songs up to his passing on, 30th March 2002 and proved himself to be one in a million, rather trillion and irreplaceable. HE is much missed by not just his family, friends and associates but fans worldwide AND CANNOT BE FORGOTTEN. Which many of the latest movies having his songs recreated, remixed proves.

MY Father Was and Is MY HERO!!! AN INCREDIBLE PERSON!!!! I miss him every day. Life is different without him, but I am blessed and grateful I got to call him “daddy.” That’s how we addressed him😊.

  • Suman Vinay Datt

 

 

 

Retro songs event organiser and amongst the finest event host, looking forward to the launch of our book on Anand Bakshi’s life story, written by Rakesh Bakshi, (with an essay by kalpa Shah Maniar) being published in 2021.

 

Tadbeer (his actions, his choices, his deeds)

 

Preface 2 of biography by screenwriter Salim Khan

फिल्‍म लेखक सलीम ख़ान

जब भारत में किसी बच्‍चे का जन्म होता है तो ना सिर्फ माता-पिता उसकी राशि के मुताबिक़ उसे एक सही नाम देते हैं, बल्कि किसी ज्योतिषी से उसकी कुंडली भी तैयार करवाते हैं। ये कोई आम परंपरा नहीं है, क्‍योंकि इससे एक छबि बन जाती है, ये विचार जीवन भर बच्‍चे के साथ चलता है। कुछ बच्‍चे जो अंधविश्‍वासी होते हैं, अपने बच्‍चे का कोई कमज़ोर या बेकार नाम रख लेते हैं। मेरे परिचित कई रईस लोग रहे हैं, जिनके नाम ऐसे थे कि उनकी हैसियत या उनके किरदार से एकदम उल्‍टे लगते थे। मैं कई ऐसे ग़रीब लोगों को जानता हूं जिनके नाम से ऐसा लगता है मानो वो बहुत ही ज्यादा रईस हैं। पर कई लोग ऐसे होते हैं, जो साबित कर देते हैं कि उनका नाम एकदम सही रखा गया है। पंजाब के एक छोटे-से गांव में पैदा हुए एक बच्‍चे का नाम रखा गया ‘आनंद’ यानी ख़ुशी और बख्‍़शी यानी ‘तोहफ़ा’। वो अपने मां-बाप के लिए एक तोहफ़ा थे। अपनी पूरी ज़िंदगी ये कवि-गीतकार अपने लाखों-करोड़ों सुनने वालों को ख़ुशियों का तोहफ़ा ही बांटता रहा। ऊपर वाले ने उसे कविता लिखने का तोहफ़ा दिया था। बहत्‍तर सालों की अपनी जिस्‍मानी ज़िंदगी और पचास सालों से ज़्यादा की अपनी पेशेवर ज़िंदगी में उसने अपनी कविता से अनगिनत लोगों को लुभाया। बहुत कम लोग आनंद बख्‍़शी की तरह ख़ुशनसीब और प्रतिभाशाली होते हैं कि वो अपने नाम और अपने नसीब को इतनी ख़ूबसूरती और अदा के साथ निभाते हैं। 

भारत की आज़ादी के दिनों में बहुत कम समाजवादी शायरों ने फिल्मी गाने लिखे, जैसे जोश मलीहाबादी, साहिर लुधियानवी, कैफ़ी आज़मी, शैलेंद्र वगैरह। उन दिनों के गीतकारों पर देशभक्ति का रंग चढ़ा था। वो राजनीतिक रूप से जागरूक भी थे और इसका असर उनके फिल्‍मी गानों पर भी नज़र आता है। किसी देश की राजनीति से आपका जुड़ाव होना या आपका किसी ख़ास विचारधारा के पक्ष में होना ग़लत नहीं है। ये हर कवि का अधिकार है कि वो अपने विचारों या धारणा पर चले। मैंने जिन कवियों-शायरों का ज़िक्र किया उन सबने कमाल के गीत लिखे हैं, लेकिन आनंद बख्शी कभी किसी समाजवादी या राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित या जुड़े नहीं थे। वह पहले और अकेले फिल्मी गीतकार थे, जो अपने काम में पूरी तरह से डूबे हुए थे और उनके गीत फिल्‍म की कहानी और उसके किरदारों से निकलकर आते थे। उन्‍होंने कभी कविता की दुनिया में नाम कमाने की तमन्‍ना नहीं की, पर फिल्‍मी गानों की दुनिया में उनसे बेहतर कोई नहीं था। जिस तरह वो फिल्‍मी गाने एकदम सहजता से लिखते थे, उसे देखकर लगता है कि मानो वो दुनिया में एक बेहतरीन फिल्‍मी गीतकार बनने की तकदीर लेकर ही आए थे। 

उस ज़माने में शैलेन्द्र, राजा मेहदी अली ख़ां, प्रेम धवन जैसे कई गीतकार पहले से ही सक्रिय थे। ज़ाहिर है कि कोई मौक़ा नहीं था और इन कोई भी इन दिग्गजों के सामने खड़ा नहीं हो सकता था, ख़ासकर एक मामूली फौजी जो गीतकार बनने का सपना देख रहा था। उस ज़माने के कई मशहूर फिल्‍मी-संगीतकारों के अपने अपने पसंदीदा गीतकार थे और वो उन्‍हीं के साथ काम करके ख़ुश थे, इसलिए आनंद बख्‍़शी के पास कोई गुंजाइश नहीं थी।

उस दौर के कई प्रसिद्ध संगीत रचनाकारों के पास पहले से ही अपने पसंदीदा कवि और गीत लेखक थे, जिनके साथ काम करके वे खुश थे, इसलिए आनंद बख्शी के पास न तो कोई गुंजाइश थी और ना ही कामयाब होने का कोई मौक़ा था। ख़ासतौर पर इंदीवर और अंजान जैसे गीतकार आनंद बख़्शी के आने से पहले से सक्रिय थे और कामयाबी की राह देख रहे थे। पर ये आनंद बख्शी की हिम्मत थी कि वो सीधे ज़बर्दस्‍त प्रतियोगिता के तूफ़ानी समुद्र में कूद गए, जहां पहले से बहुत बड़ी मछलियां मौजूद थीं।

आनंद बख्‍़शी के पास मज़ाक और संगीत दोनों की गहरी समझ थी। दिलचस्‍प बात ये है कि उनके अंदर गहरी फिलॉसफी को भी बहुत ही आसान और कम शब्‍दों में बयां करने की काबलियत थी। धीरे-धीरे लगातार उन्‍हें फिल्‍मों में गाने लिखने का मौक़ा मिलने लगा। वैसे भी मुंबई फिल्‍म जगत के बारे में कहा जाता है कि यहां ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो उगते हुए सूरज की किरणों और उसकी गरमी को सलाम करना और उसकी इबादत करना ना जानते हों। जब आनंद बख्‍़शी कामयाबी के दरवाज़े खटखटा रहे थे और वो पूरी तरह से खुले नहीं थे, ठीक उसी वक्‍त एक और सूरज उग रहा था, लक्ष्‍मीकांत-प्‍यारेलाल का सूरज। इस जीनियस संगीतकार जोड़ी ने आनंद बख़्शी की प्रतिभा को पहचाना। इस तरह आनंद बख्‍़शी जल्‍दी ही उनके पसंदीदा और चुनिंदा गीतकार बन गये। आनंद बख़्शी, लक्ष्‍मीकांत और प्‍यारेलाल की इस तिकड़ी ने हिंदी फिल्‍मी गीतों के इतिहास को बदलकर रख दिया। इन्‍होंने एक साथ क़रीब 303 फिल्‍मों के गीत तैयार किए। इसी तरह की जोड़ी उनकी आर. डी. बर्मन के साथ भी बनी, जिनके साथ उन्‍होंने 99 फिल्‍में कीं।

बख़्शी बहुत ही सीधे-सादे, बिना दिखावे वाले और ईमानदार इंसान थे। उन्‍हें हवाई जहाज़ में सफ़र करने से और ऊंची इमारतों की बंद लिफ़्ट में जाने से डर लगता था। छोटी-छोटी तंग लिफ़्ट उन्‍हें डराती थीं इसलिए वो ऐसे लोगों या दोस्‍तों के पास नहीं जा पाते थे, जो ऊंची इमारतों में रहते या काम करते थे। ज़िंदगी की ऊँचाई उन्‍होंने सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़कर ही छुई और अपनी प्रतिभा की ताक़त से सीढियां चढ़ते हुए कामयाबी के शिखर पर पहुंचे। दुनिया में कामयाबी के लिए किसी मशीन या किसी सहारे का उन्‍होंने इस्‍तेमाल नहीं किया। वो पंजाब के एक छोटे से गांव की अपनी मज़बूत जड़ें और अपनी तहज़ीब लेकर आए थे, गांव उनके दिल में धड़कता था। इसलिए वो मायानगरी बंबई में कभी खोए नहीं, मुश्किलों और माया-मोह के जंगल में उन्‍होंने अपने सपनों के रास्‍ते को खोने नहीं दिया। उनकी सादगी और विनम्रता उनकी ताकत थी, इसी ने लगातार कामयाबी के दिनों में भी उनको बचाकर रखा। अपनी सादगी की वजह से ही उन्‍होंने गांव और शहर के लोगों का और इसके साथ साथ विदेशों में बसे भारतीयों का दिल जीता। रोज़मर्रा के शब्‍दों में ज़िंदगी के गहरे फ़लसफ़े को पिरोकर उन्‍होंने पूरी दुनिया में बसे फिल्‍म-संगीत के चाहने वालों के दिलो-दिमाग़ पर क़ब्‍ज़ा कर लिया। ये उनकी सादगी ही थी कि वो अकसर ये कहकर मेरे घर आ जाया करते थे—
“भाई, चूंकि आप पहली मंजिल पर रहते हैं और किसी को आपके घर तक पहुंचने के लिए लिफ्ट से सफ़र नहीं करना पड़ता और चूंकि आपकी प्यारी बीवी सलमा सबसे लज़ीज़ खाना बनाती है, मैं आज रात आपके घर खाने पर आ रहा हूं।”

आमतौर पर मैंने देखा है कि फिल्‍मी-दुनिया में तमाम मशहूर हस्तियां, तमाम सितारे अपने असली मक़सद को छिपाते हैं, पर बख़्शी इस मामले में अनूठे थे क्‍योंकि जो उनके दिल में होता था, उनकी ज़बां पर आ जाता था। हम सब जानते हैं कि अपने गीतों की गहराई की वजह से आनंद बख़्शी बहुत मशहूर हुए। ज़िंदगी के हर मोड़ से उन्‍होंने सीखा। वो ये बात बहुत शिद्दत से मानते थे कि ज़िंदगी का हर पल आपको कुछ ना कुछ सिखा रहा है, पर हम ज़िंदगी में कामयाबी और पैसों के पीछे भागने में इतने मशगूल हो जाते हैं, हम अपनी चुनौतियों और अपने सपनों में इतने खो जाते हैं कि ज़िंदगी हमें क्‍या सिखा रही है, ये देख पाने की मोहलत तक हमें नहीं मिल पाती और इसी वजह से हम कुदरत की सिखायी बातों को समझ नहीं पाते। समय की रेत पर हम अपने क़दमों के निशान छोड़ते चले जाते हैं, इस रेत के हर कण पर ज़िंदगी के सबक छपे हुए होते हैं, पर अफ़सोस, हम उनकी तरफ़ नज़र उठाकर नहीं देखते।    

बख्‍़शी ने मुझे ये सबक सिखाया और इसी बहाने मुझे याद आ गया कि फिल्‍म ‘नाम’ लिखते वक्‍त एक बड़ी दिलचस्‍प बात हुई थी। मेरी फिल्‍म का हीरो बेहतर ज़िंदगी की तलाश में अपने परिवार को छोड़कर विदेश चला जाता है पर वो वहां अपनी महत्वाकांक्षाओं के जाल में फंस जाता है। अचानक उसे अपनी मां की याद आती है, उसे अपने वतन में अपने परिवार का प्‍यार याद आता है। बख्‍़शी ने इस हीरो की तकलीफ़ और उसके दर्द को बड़ी अच्‍छी तरह से समझ लिया और एक ऐसा गाना रचा, जो उसके सबसे मशहूर गीतों में से एक है। इस गाने की बिना पर फिल्‍म ने ज़बर्दस्‍त कारोबार किया। यक़ीन मानिए फिल्‍म की कामयाबी में इस गाने का बड़ा योगदान है। ये गाना था—‘चिट्ठी आयी है, वतन से चिट्ठी आई है’।

बख़्शी ने अपनी क़ीमत पहचानने के बारे में मुझे एक कहानी सुनायी थी। एक कामयाब और मशहूर अंग्रेज़ कवि की एक कविता अधूरी रह गयी थी। कई बार कोशिश की कि पर वो इस कविता को पूरा नहीं कर पाया। उसे अहसास हुआ कि इस कविता को पूरा करने के लिए उसे किसी से मदद लेनी होगी। एक दोस्‍त ने उसे बताया कि तुम दूर एक गांव में चले जाओ, वहां तुम्‍हें एक बुज़ुर्ग लेखक मिलेगा, उसके पास प्रतिभा तो है पर वो उसे कभी पहचान नहीं पाया। पर उसके भीतर कमाल का आत्‍मविश्‍वास है। वो जानता है कि वो कामयाबी का हक़दार है भले ही कामयाबी उसे मिल नहीं रही है।
 
कामयाब और मशहूर लेखक दूर-दराज़ के उस गांव में गया, उस बुज़ुर्ग लेखक से मिला और उससे मदद मांगी। बुज़ुर्ग लेखक ने वो अधूरी कविता पढ़ी और कहा कि वो इसे पूरी तो कर देगा पर उसे इसके बदले में पाँच सौ पाउंड स्‍टर्लिंग चाहिए। ज़ाहिर है कि कामयाब लेखक राज़ी हो गया और जल्‍दी ही इस बुज़ुर्ग ने कविता पूरी कर दी।  

कामयाब लेखक हैरान रह गया कि बुज़ुर्ग लेखक ने इतनी जल्‍दी और इतने कम शब्‍दों में कविता कैसे पूरी कर दी। उसने अपनी चेक-बुक निकाली ताकि बुज़ुर्ग को तयशुदा पाँच सौ पाउंड स्‍टर्लिंग दे सके। उसने बुज़ुर्ग लेखक से पूछा कि इतने आसान और कम शब्‍दों वाले काम के लिए आपने पाँच सौ पाउंड स्‍टर्लिंग मांगे, क्‍या ये जायज़ है? ये काम तो फटाफट हो गया।  

बुज़ुर्ग लेखक ने जवाब दिया, “आप इसलिए मुझे पैसे देने में हिचक रहे हैं क्‍योंकि आपको लग रहा है जिस काम को मैंने इतनी आसानी से कुछ ही मिनिटों में पूरा कर लिया, उसके लिए मुझे इतने पैसे नहीं मांगने चाहिए थे। हालांकि मैंने काम ऐसा किया कि आपको पूरी तसल्‍ली हो। आप इस बात पर ध्‍यान दे रहे हैं कि मैंने कुछ ही मिनिटों में काम कर लिया पर आप इस बात पर ध्‍यान नहीं दे रहे कि मैंने ज़िंदगी के कितने सालों का अनुभव लगा दिया है तब जाकर ये काबलियत आयी है कि मैं कुछ ही मिनिटों में उम्‍दा तरीक़े से आपकी कविता को पूरा कर पाऊं। आप बस वो चंद लम्‍हे ही गिन रहे हैं जो आपने मेरे साथ बिताए पर आप उन लाखों करोड़ों पलों को भूल रहे हैं जिन्‍हें बिताने के बाद मैं यहां तक पहुंचा हूं। इतनी लंबी ज़िंदगी के उन तजुर्बात का शुक्रिया कि जिनकी वजह से मैं आपकी अधूरी कविता को चंद मिनिटों में ही पूरा कर पाया।” कामयाब और मशहूर लेखक को ये बात फौरन समझ में आ गयी और वो शर्मिंदा हुआ। उसने फौरन ही तयशुदा फीस अदा कर दी।

अपनी मौत से ठीक पहले जब आनंद बख्‍़शी बीमार थे, तो अस्‍पताल से उन्‍होंने सुभाष घई की फिल्‍म ‘मजनूँ’ के लिए एक गाना लिखा, ये फिल्‍म अभी तक रिलीज़ नहीं हो सकी है। जब मैंने वो गाना सुना तो उसमें कविता की जो गहराई थी, उसे महसूस करके मैं दंग रह गया था। मुझे इस बात पर भी हैरत हुई कि उन्‍होंने ये गाना अपनी बीमारी के दिनों में लिखा था, अपनी मौत से ठीक पहले। ऐसा उन्‍होंने इसलिए किया क्‍योंकि लिखना उनका मज़हब ही नहीं था, उनकी ज़िंदगी था, ज़िंदगी और मौत के इस सिलसिले में लिखना उनका एक मिशन था, वो सिर्फ़ उनकी तक़दीर नहीं थी। हमारे यहां कई शायर हुए हैं, उनसे बेहतर शायर, पर गीतकारों में वो सबसे ऊपर रहे। 30 मार्च 2002 को उन्‍होंने इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह दिया। सन 1957 से शुरू करके उन्‍होंने साढ़े छह सौ फिल्‍मों में साढ़े तीन हज़ार गाने लिखे। उन्‍होंने हर मौक़े और ज़िंदगी के हर रिश्‍ते के लिए गाने रचे, जबकि बख्‍़शी अपनी स्‍कूल की पढ़ाई भी ठीक से पूरी नहीं कर पाये थे। बख़्शी एक पैदाईशी सितारे थे। वो मिथक बन गये। मिथक कभी मरते नहीं हैं। बख्‍़शी हमेशा अपने गानों के ज़रिए हमारे दिलों में ज़िंदा रहेंगे।

Rakesh Bakshi with Saliim Khan saab:

English:

When a child is born in India, the parents not only give him an appropriate name according to his star sign, but also get his Destiny Chart prepared by an astrologer. This is no ordinary custom, as it could be an image and reflection of a life time. Some people who believe in superstitions keep a weak or inappropriate name for their child, as I have known of some rich people who have names which when translated mean opposite to their financial status and character and I also know of poor people who have names that translate to being a person of immense wealth. But some people prove in their life time that they were rightly named. A child born in a tiny village in Punjab was named Anand (Happiness) Bakshi (To gift) by his parents; and all his life this poet gifted happiness to millions of his musical listeners. He was gifted with the talent of writing poetry that enthralled millions of people in his life time of 72 years and professional life span of more than 50 years. Very few people are as fortunate and as gifted to be able to fulfil their destiny on Earth with such flair and style as the late Anand Bakshi.

During the period of Indian Independence very few socialists’ poets wrote film songs, like poet Josh Malihawadi, Sahir Ludhianvi, Kaifi Azmi, Shailandra. The poets of that period were colored with colors of Indian Nationalism. And they were Politically colored too, the effect of which we heard in their film songs too. To be attached to the Politics of the State, or to have belief in a particular ideology is not incorrect. Every poet has a right to his or her belief and conviction. All these above-named poets have written wonderful songs, but Anand Bakshi was never influenced or attached to any socialist or political ideologies. He was first and foremost a film song writer who was completely immersed and his writings emerged from the characters and the narrative of the film’s story. He didn’t have and aspire for fame in the world of Poetry, but he was amongst the very best in the world of Film songs. His success in writing film songs could make one feel that he took birth only to fulfil his destiny of being the best lyricists.

In that period there were already great established poets like Shailendra, Raja Mehdi Ali Khan, Prem Dhawan and others. There was no opportunity and no one could stand against these giants, especially a meagre soldier ambitious to be a Poet. The many famous music composers of that period already had their own favorite poets and song writers they were happy working with, so there was no scope nor chance of Anand Bakshi breaking through, especially with other good poets like Indeevar and Anjaan waiting to breakthrough much before Anand Bakshi arrived with his pen and paper. But it was the courage of Anand Bakshi that he jumped straight on into the fiery sea of competition where much bigger fish were already the major players.

Anand Bakshi had a great and good sense of humor and music and he even had the gift of capturing and expressing deep philosophies in lesser and simpler words. Slowly but gradually he began to receive work to write film songs. The unsaid rules of the film business say there is no dearth of people in this business who will not value the warm and brilliant rays of the rising Sun and worship it. When Anand Bakshi was knocking on the doors of success and they were yet to begin opening completely, at the same time there appeared on the horizon the rising Sun of Laxmikant Pyarelal. The musical duo and geniuses recognized the talent in Anand Bakshi and soon made him their favorite and preferred lyrics writer. The triangle of Anand Bakshi, Laxmikant, and Pyarelal, rewrote the musical history of Hindi film songs, nearly 303 films. So did he make a great pair with R. D. Burman, 99 films.

Bakshi was a very simple, non-pretentious, and sincere man. He had a phobia for air travel and travel in enclosed lifts of high-rise buildings. The claustrophobic and small lifts made him fear traveling to meet work mates or friends who worked or lived in high rise buildings. He climbed high on the steps of life and reached the pinnacle of success climbing every step of life on the strength of his talents. He was not one who would have used any sort of machine other than his talent to rise high in this world. It was the deep culture and the strong roots of his simple village in Punjab that beat in his simple heart, that’s why he never found himself lost in the mega dream city of Bombay, the path to his dreams but a jungle of illusions and obstacles. His simplicity and humility was his strength that kept his head above water even though he tasted success consistently, year after year. His humility was also the very bridge that helped him crossover into the hearts of the people of the heartland, his rural listeners, along with his urban and international non-resident Indians. He forged ties with both the hearts and the minds of his listeners all over, by use of simple everyday spoken words carrying the deepest philosophies. His simplicity was so sincere that he would often invite himself to my home by saying, “Because you live on the first floor and one does need to travel by lift to reach your home, and since your beloved wife Salma cooks the most delicious meals, I am coming over for a meal at your Home tonight.”

He was unique in the sense that normally in the world of show business I experienced that most celebrities and people hide their true intentions. Unlike Bakshi, their hearts don’t reflect what their mind speaks. Similarly, Anand Bakshi achieved much fame through the depth in his writing which he earned via his life’s varied experiences. He firmly believed that at every moment life is offering you lessons, but because we are preoccupied with life’s material and physical goals, overwhelmed by our ambitions and challenges in life’s paths, we are unable to absorb the valuable lessons life offers us alongside. We have cut short the antennae that helps us pick these signals and lessons of life, and thus we do not recognize the teachings of Mother Nature. Life’s lessons are imprinted in the very grains of sand that we leave our footprints on, but sadly we blind ourselves to them.

This lesson Bakshi taught me makes me recollect, an incident from the film I wrote, “NAAM”. The protagonist in my story has migrated to a foreign land to earn a better living for his family. But he gets trapped in the illusion of ambitions. But he suddenly remembers his Mother and now he badly misses the love of his family back home. Bakshi understood the pain and suffering of the protagonist so well and he expressed himself in a most popular song, on the strength of which the film did a roaring business. The song helped the film do much better. The song was “Chitti aayee hai watan se chitti aayee hai.” (A letter from Home has arrived, a memory of love has arrived.)

Bakshi told me a story about valuing your self-worth.A successful and famous English writer had an unfinished poem. The last paragraph was left unfinished in spite of many attempts. He realized he needed help to finish his poem. One of his friends recommended that he travel to a distant village and there he will find an old writer who has the talent but was never recognized for. But he is high on self-esteem as he knows he is worthy even though he didn’t get fame. 

 The successful and famous writer travelled to the distant village and he met the old writer and asked him for his help. The old writer read the incomplete poem and said he can compete the poem but he will charge 500-pound sterling for the job. The successful and famous writer agreed to the terms and very soon the old writer had done his job. He completed the unfinished poem. 

The successful writer was surprised that the old writer finished the incomplete poem so quickly and in a few words. He removed his check book to pay the old writer and hesitated while paying the old writer the contracted amount of 500-pound sterling. He asked the old writer if he was justified in asking for 500 pounds sterling for such an easy job accomplished by him within a few minutes. 

 The old writer replied, “You are hesitating to pay me because you are not convinced that I should charge you so much money for a job I accomplished with much ease and in a few minutes, even though it’s been done to your satisfaction. You are taking into account the few minutes I took to complete your poem, but you are not taking into account the many years I have lived and experienced life to be able to arrive at this moment in my life which gives me the wisdom and experience to be able to complete your poem. You are only counting these few minutes you have spent with me but not considering the millions of moments I have spent to reach here today. It’s only thanks to the long life I’ve led that I could accomplish the job for you in a few minutes.” The successful and famous writer was humbled and humiliated in the presence of the wise writer and immediately paid the writer his fee willingly.”

Before the dawn of his death, from his death bed in the Hospital, Bakshi wrote a song for Subhash Ghai for a yet to release film MAJNU. I was awestruck by the depth of the lyrics when I heard them. It also amazed me that he wrote the song in illness just before death arrived knocking at his doorsteps. I believe he wrote so, because writing was not only his religion, but his breath, his mission for the cycle of life and death, much beyond his destiny. There have been many poets much better poets than him, but he was the most supreme amongst the song writers. He passed by in march 30th 2002, and since 1957 he wrote more than 650 films and 3500 film songs. He wrote songs for every occasion and relationship of life, even though he didn’t even manage to complete his higher schooling. Bakshi was a Star born. He became a Legend. And Legends never die. He lives in his songs and in our Hearts.

  • Salim Khan

Preface by Javed Akhtar

Woh jazbaat ka kaunsa modh hai, woh ehsaas ki kaunsi manzil hai, woh thadkanon ki kaunsi ruth hai, woh mohhabat ka kaunsa mausam hai, woh zindagi ka kaunsa mukaam hai, jahan suron ke badalon se Anand Bakshi ke geeton ke chand jhalakte na hon! Anand Bakshi. aaj ke folk writer hain; Anand Bakshi aaj ke samaaj ke shayar hain.

British National Museum mein jahan Egypt ki barson purani mummies rakhi hain, Hindustan ke baadshaon ke sharaab ke pyale aur khannjar rahke hain, jahan Rome ke tehzeeb ke nishanath aur souvenirs rahke hain, wahan ek bahut bada hall hai jahan mashhoor angrez writers ki manuscripts, literature and poetry, unki rough books, note books, rakhi hui hain kaanch ke showcases mein. Wahan George Bernard Shaw, William Shakespeare, Oscar Wilde hain, Charles Dickens hain, Keats hain; aur wahan ek showcase mein Beatles ke haath ka likha huwa geet ‘Yesterday’, bhi rakha huwa hai. Inn baaton se, hakikaton se, humme pata chalta hai – ek toh yeh ki woh kaum Beatles ki izzat karti hai; Doosra yeh pata chalta hai, ki uss kaum mein itni khud-mati hai, self-confidence hai ki woh literature-writer Shakespeare ke saath song writer aur musician Paul McCartney ki izzat karne mein apne aap ko gair-mehfoos nahin samajhti. Mujhe dukh se kehana padhta hai ki humari kaum, humari akademia mein, humare intellectuals mein, yeh self-confidence abhi tak nahin aaya.

Aaj shayad koi maane ya na maane, lekin main apne khoon se yeh likh ke de sakta hoon ke ek din aayega jab log jaanenge, ki Anand Bakshi ka aaj ke geeton aur aaj ki shayari mein kitna bada contribution hai! Aur uss din, Anand Bakshi pe thesis likhi jayengi aur Phd ki jayegi universities mein. 

 

  Biography of Anand Bakshi arriving in English (by Rakesh Anand Bakshi @ Penguin India/Penguin Random House) March 2021 & and in Hindi (Translated by radio presenter Yunus Khan)

 

 

Thanks to my wife’s support and the songs’ co-creators – music composers, singers, directors, musicians, sound recordists, story writers, producers, cinematographers, actors….. my songs become successful; it is always team work, no one is an island.

 

He wrote these affirmations on the first page of his writing-diary:

Om Namah Shivay

Jai shri Krishan bhagwan

Jai Hanuman

Jai Lakshmi mata

Jai Saraswati mata

Jai Durga mata

Jai Ram

Jai Baba Nanak

Jai Sai Baba

Jai Bajrang Bali

Jai Ma Sheranwali/Jai Mata di

Jai Ganesh

Jai Ajmer wale Khwaja

Jai Swani Nityanand

Jai Nagdevta, mere kul rakshak

Jai Shiv ji

Jai Ganesh Brahma Vishnu Mahesh

Jahan viraje Ram, Dar ka wahan kya hai kam?

Jai to myself, God bless me. God Bless my Home.

 

Anand Bakshi was also inspired by the following thoughts, which he noted in his personal diary over the years. Few of these quotes are his own, I believe. Some of these quotes he read in The Readers Digest and other print sources:

 

Rare indeed is the human birth. The human body is like a boat, the first and the foremost use of which is to carry us across oceans of life and death, to the shores of immortality. The Guru is the boatman, and God is the favorable wind. If with such means as these, man does not strive to cross the ocean of life and death, he is indeed spiritually dead.

 

Rarely would our father make us hear a song’s lyrics on writing it. This is a song whose lyrics he made us children hear and said – … irrespective of having family and friends around you, depend only on yourself to help yourself and others. No one is as dependable as you for yourself and others. (I am my best friend, and will never let myself down under any circumstances, as I will always be with me help myself, so I cannot ever be helpless.)His song ‘Mushkil mein hai kaun kissi ka, samjho iss raaz ko, lekar apna naam kabhi tum khud ko awaaz do’ … depend only on yourself, all on yourself when you are in trouble (Angaar 1992) https://youtu.be/EyB_L12HpiA)

 

Happenings means life. Life brought me into this world of happenings. Death will take me back where nothing happens. Just nothing.It is only after death that nothing happens. After death a person goes into nothingness. (Chitti Na koi sandesh, jaane yeh kauna desh, jahan tum chale gaye- Dushman. https://youtu.be/wEO4Dxl882A)No feelings, no sound. I too will remain in that atmosphere of nothingness for a while, then again, something will happen, and I will get a new life, new name, new game, new people around me, new childhood, new body, each and everything new. What is there to worry? Nothing.Life and death are my permanent companions, as rebirth is a fact. This coming and going will go on forever. Life and death, both are very beautiful. Life is work, nothing else. Death is rest, nothing else. Without death, life has no beginning, no ending, no meaning. Why run away from death? Death is nowhere, yet everywhere, with you, within you. Accept that I cannot live forever. 

 

He who is not here, must be somewhere. He who is somewhere is not lost. Believe in immortality, and use it while living.  Though Earth and Moon were gone, and suns and universe ceased to be, and Thou were left alone, every existence would exist in Thee.

 

When we fear, we doubt God. Do I doubt God? No. I believe in God. I am myself a little proof of God. He is seven seas. I am a drop of water. I am from Him, for Him. (Main aatma, tu parmatma – https://youtu.be/6zdTc2PKG1E)

 

If you think you have got something for nothing, you have not received the bill yet.

 

I have never met a person who has given me more trouble than myself.

 

I meet trouble as a friend as I know I am going to see a lot of him, so I better be on good terms with it. Moreover, trouble creates a capacity to handle it.

 

Frustration is commonly the difference between what you would like to be, and what you are willing-to-sacrifice to become what you would like to be.

 

Do not try to do it – Do It!

 

Life is a chance. If you take it, it’s risky. If you do not take it, it’s dangerous.

 

You cannot cross a bridge before it comes. There is no bridge that cannot be crossed.

 

For every evil under the sun, there is a remedy, or there is none. If there is one, find it. If there is none, never mind it.

 

Things I could change, I changed to suit me. Things I could not change, I changed myself to suit them.

 

You can create that extra ordinary force within you, by using it. You cannot store it. You can only use it.

 

Troubles and Human beings are made for each other. They cannot be separated.

 

Courage is taking the step forward, into an area of difficulty, without a solution in mind, trusting that somehow help will become available.

 

Don’t resist fear. Come directly into contact with it to understand it. Relax, and enjoy the journey. 

 

Tumhari taqdeer (destiny) and tadbeer (actions, deeds choices), tumare hi haaton mein hai. Tumhe kudh apni life-story likhi padhegi.

 

Rare Rare Rare verse …
dekha yeh ghar toh oonche,
mehlon ne sar jhukaye,
mujhe tum yaad aaye.
This verse was deleted from the film later. (TAQDEER) – LP/M Rafi
https://youtu.be/0wtBIrv0zAU
 
 

There are a few unreleased songs from released and unreleased films I have made available on his YouTube channel for listeners, as they belong to you all. Songs of Mahesh Bhat’s Dhun, Hiren Khera’s Hey Ram, Raj Kapoor’s Satyam Shivam Sundaram and others. The song from Dhun by Mehdi Hassan, Talat Aziz and one from Hey Ram by Lata Mangeshkar and Mohammed Rafi are two spiritual lyrics that are amongst his best writing, moreover, reflect the soul of the daddy we the family were privy to. I wish you look them up. Stay inspired.

https://youtu.be/4qDIbw-V1y0

https://youtu.be/6zdTc2PKG1E

 

The only last photograph we have of them together. Anand Prakash Bakhshi with Kamla Mohan Bakshi. Location: Mahableshwar. 

Photo courtesy Veena & Arvind Divay, favorite niece of Kamla Balshi.

 

(Work in progress, your feedback, suggestions, corrections are welcome at rakbak16@gmail.com)

Biography of Anand Bakshi by Rakesh Bakshi now available athere
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